मात्र कह देने से सब कुछ ठीक नहीं हो जाता है, स्वयं का विचार और व्यवहार भी उस अवस्था के अनुकूल होना चाहिए, जिसको हम लागू करना चाहते है
वर्तमान की सोच और कर्म उस परिणाम से भिन्न है, जिस सोच कर्म की वास्तिविकता को हम जिस नियम क्रम पद्धति के परिणाम में देखना चाहते है।
मतलब ये कि किसी भी पद्धति को उसके बनाए हुए प्रमाणित नियम को उसी क्रम नियम अनुसार बार बार करने पर परिणाम की स्थिति भले ही अलग हो लेकिन उसका उद्देश्य वही होना चाहिए।
वर्तमान में जनता के द्वारा चुनाव के तरीके को यानि चुनाव के क्रम की सोच को बदला गया है, जिसके कारण परिणाम का उद्देश्य बदला गया है, जिस उद्देश्य के लिए चुनाव किया गया था, वो उद्देश्य परिणाम में दिखाई नहीं देता है,
उदाहरण से समझे ---
"जनता को अपना क्षेत्रीय उम्मीदवार का चुनाव उम्मीदवार की सोच और व्यवहार को देख कर करना था,
लेकिन पार्टी या समूह के द्वारा चुनकर भेजे गए उम्मीदवार को, जनता के द्वारा बिना किसी शर्त, तर्क या विरोध के उस उम्मीदवार का चुनाव कर लेना लोकतांत्रिक व्यवस्था को उजागर नहीं करता है,
मतलब चुनाव सीधे जनता के द्वारा नहीं किया जाता है, बल्कि किसी अन्य संस्था द्वारा किया जाता है,
यानि यदि कोई गलत मानसिकता वाला उम्मीदवार पार्टी या अन्य संगठन द्वारा चुन लिया जाता है, तब भी जनता बिना तर्क या विरोध किए उस उम्मीदवार को अपनी सहमति दे देती है, जिसका परिणाम वर्तमान में जनता के समक्ष है, लेकिन जनता में रंग भाषा धर्म जाति पार्टी की आस्था होने के कारण लोकतांत्रिक व्यवस्था को स्वीकार नहीं कर पा रही है।
जबकि जनता की सोच और जनता का चुनाव ही आने वाली पीढ़ी और देश की जनता के भविष्य का निर्माण करती है

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